November 7, 2026

विश्व रेबीज दिवस 2026: कुत्ते के काटने के बाद ये गलती पड़ सकती है भारी, समय पर इलाज से बच सकती है जान

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रेबीज के लक्षण सामने आने के बाद बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा, लेकिन समय पर उपचार से मौत को रोका जा सकता है; इस साल ‘Stronger Together’ है विश्व रेबीज दिवस की थीम

नई दिल्ली। कुत्ते का काटना आम घटना लग सकती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही घटना जानलेवा रेबीज का कारण बन सकती है। खास बात यह है कि रेबीज से बचाव के लिए प्रभावी वैक्सीन और उपचार उपलब्ध हैं, फिर भी समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण हर साल दुनिया में हजारों लोगों की मौत होती है।

हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “Stronger Together” यानी “मिलकर अधिक मजबूत” रखी गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस संदेश का उद्देश्य यह बताना है कि रेबीज को खत्म करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पशु चिकित्सा, स्थानीय प्रशासन, समुदाय और सरकारों को मिलकर काम करना होगा।

हर साल करीब 59 हजार लोगों की मौत

WHO के अनुसार दुनिया के 150 से अधिक देशों और क्षेत्रों में रेबीज का खतरा मौजूद है। हर साल करीब 59 हजार लोगों की मौत इस बीमारी के कारण होती है। इनमें 95 प्रतिशत से अधिक मामले अफ्रीका और एशिया में सामने आते हैं और बच्चों पर इसका असर विशेष रूप से अधिक है।

मानव रेबीज के करीब 99 प्रतिशत मामलों में संक्रमण कुत्तों से जुड़ा होता है। इसलिए रेबीज की रोकथाम के लिए केवल मनुष्यों के उपचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण बीमारी को उसके स्रोत पर रोकने की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में शामिल है।

रेबीज क्यों है इतनी खतरनाक बीमारी?

रेबीज एक विषाणुजनित बीमारी है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। संक्रमित पशु की लार के माध्यम से वायरस शरीर में पहुंच सकता है। आमतौर पर संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने से संक्रमण होता है।

शुरुआती दौर में बुखार, कमजोरी, बेचैनी या काटे गए स्थान के आसपास दर्द, झुनझुनी अथवा जलन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। बाद में वायरस मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। मरीज में बेचैनी, भ्रम, निगलने में कठिनाई, पानी से डर जैसी स्थिति, लकवा और अंततः कोमा जैसी गंभीर अवस्था विकसित हो सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक बार रेबीज के चिकित्सकीय लक्षण विकसित हो जाने के बाद बीमारी लगभग हमेशा घातक होती है। इसलिए बचाव का सबसे महत्वपूर्ण अवसर काटने या संभावित संक्रमण के तुरंत बाद होता है।

कुत्ते के काटने के बाद सबसे पहले क्या करें?

कुत्ते या किसी संदिग्ध संक्रमित पशु के काटने अथवा खरोंचने पर घबराने के बजाय तुरंत प्राथमिक उपचार शुरू करना चाहिए।

सबसे पहला कदम है घाव को साबुन और बहते पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना। इसके बाद जितनी जल्दी हो सके स्वास्थ्य केंद्र या चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

घाव पर मिट्टी, मिर्च, तेल, राख, चूना या अन्य घरेलू पदार्थ लगाने से बचना चाहिए। यह सोचकर भी उपचार में देरी नहीं करनी चाहिए कि घाव छोटा है या खून कम निकला है।

रेबीज का जोखिम केवल गहरे घाव से तय नहीं होता। चिकित्सक संपर्क के प्रकार और परिस्थितियों का आकलन करके आगे के उपचार का निर्णय करते हैं।

PEP समय पर मिलना बेहद जरूरी

काटने के बाद दी जाने वाली पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) रेबीज से बचाव का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें घाव की उचित सफाई, जरूरत के अनुसार रेबीज वैक्सीन और कुछ गंभीर संपर्कों में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन शामिल हो सकता है।

WHO के अनुसार समय पर उचित PEP वायरस को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचने से रोकने में प्रभावी है। इसलिए संभावित जोखिम के बाद व्यक्ति को खुद से यह तय नहीं करना चाहिए कि टीके की जरूरत है या नहीं। इसके लिए स्वास्थ्यकर्मी से तत्काल सलाह लेना जरूरी है।

हर कुत्ता संक्रमित नहीं, लेकिन जोखिम को नजरअंदाज भी न करें

कुत्ते के काटने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से रेबीज हो जाएगा। इसी तरह हर आवारा कुत्ता रेबीज से संक्रमित नहीं होता। लेकिन किसी पशु के स्वास्थ्य या संक्रमण की स्थिति का आकलन केवल उसके सामान्य दिखाई देने से नहीं किया जा सकता।

इसलिए संभावित जोखिम वाली घटना के बाद उपचार में देरी करना सही नहीं है। यदि उपलब्ध हो तो काटने वाले पशु की पहचान और उसके टीकाकरण से जुड़ी जानकारी चिकित्सक को देना उपयोगी हो सकता है।

बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत

रेबीज का बोझ बच्चों पर विशेष रूप से अधिक है। WHO के अनुसार वैश्विक स्तर पर रेबीज से होने वाली मौतों में लगभग 40 प्रतिशत पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं।

बच्चे अक्सर अनजान कुत्तों के साथ खेलने, उन्हें छूने या भोजन करते समय उनके पास जाने की कोशिश करते हैं। इसलिए परिवार और स्कूलों में बच्चों को पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार की जानकारी देना जरूरी है।

बच्चों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि किसी पशु के काटने या खरोंचने की घटना को छिपाना नहीं है। तुरंत माता-पिता, शिक्षक या किसी जिम्मेदार व्यक्ति को इसकी जानकारी देनी चाहिए।

कुत्तों का टीकाकरण ही संक्रमण की कड़ी तोड़ने का रास्ता

रेबीज नियंत्रण में केवल इंसानों को वैक्सीन देना पर्याप्त नहीं है। बीमारी के मुख्य स्रोत यानी संक्रमित कुत्तों में वायरस का प्रसार रोकना भी जरूरी है।

WHO के अनुसार बड़े पैमाने पर कुत्तों का टीकाकरण रेबीज को उसके स्रोत पर नियंत्रित करने का प्रभावी तरीका है। मानव उपचार, कुत्तों का टीकाकरण, निगरानी और जन-जागरूकता को एक साथ आगे बढ़ाने से संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सकता है।

भारत में भी बड़ी चुनौती

भारत में रेबीज और पशु-काटने की घटनाएं महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई हैं। WHO के अनुसार भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के 2024 में प्रकाशित अनुमानों के आधार पर देश में हर साल लगभग 91 लाख पशु-काटने की घटनाएं होती हैं। इनमें तीन-चौथाई से अधिक घटनाएं कुत्तों से जुड़ी हैं।

इसी अनुमान में भारत में हर साल करीब 5,726 मानव रेबीज मौतों का उल्लेख किया गया है। WHO के अनुसार यह अनुमान करीब दो दशक पहले बताए गए 20 हजार वार्षिक मौतों के अनुमान की तुलना में काफी कम है, लेकिन बीमारी अभी भी गंभीर चुनौती बनी हुई है।

पालतू कुत्तों के मालिकों की भी जिम्मेदारी

रेबीज की रोकथाम में पालतू पशु मालिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कुत्तों का नियमित टीकाकरण कराना, टीकाकरण का रिकॉर्ड रखना और पशु के स्वास्थ्य एवं व्यवहार में असामान्य बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है।

पालतू पशु को सार्वजनिक स्थानों पर ले जाते समय भी जिम्मेदार व्यवहार जरूरी है। यदि कोई पालतू पशु किसी व्यक्ति को काटता है तो घटना को छिपाने के बजाय तुरंत संबंधित व्यक्ति और चिकित्सकीय व्यवस्था को जानकारी देनी चाहिए।

आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान केवल हटाना नहीं

शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों की आबादी का प्रबंधन रेबीज नियंत्रण से सीधे जुड़ा विषय है। इसका समाधान केवल कुत्तों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाने तक सीमित नहीं हो सकता।

कुत्तों का सामूहिक टीकाकरण, वैज्ञानिक आबादी प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और स्थानीय समुदाय की भागीदारी साथ-साथ जरूरी हैं। पशु कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों को ध्यान में रखकर लंबे समय की रणनीति तैयार करनी होगी।

One Health मॉडल से मिलेगी मजबूती

रेबीज ऐसी बीमारी है जो मानव और पशु स्वास्थ्य के बीच सीधा संबंध दिखाती है। इसलिए इसे नियंत्रित करने में One Health दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है।

स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सक संक्रमित व्यक्ति को समय पर उपचार उपलब्ध कराते हैं। पशु चिकित्सक संदिग्ध पशुओं की जांच और टीकाकरण में भूमिका निभाते हैं। स्थानीय निकाय कुत्तों की आबादी और टीकाकरण अभियान संभालते हैं, जबकि समुदाय संभावित मामलों की जानकारी और जागरूकता में सहयोग करता है।

WHO ने 2026 के विश्व रेबीज दिवस के संदेश में भी मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया है।

भूटान ने दिखाया कि रेबीज खत्म करना संभव है

रेबीज उन्मूलन की दिशा में सितंबर 2026 में भूटान ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। WHO ने भूटान को कुत्तों से फैलने वाले मानव रेबीज को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने वाला देश मान्य किया है। यह WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र का पहला ऐसा देश बना।

भूटान में जून 2023 के बाद कुत्तों से फैलने वाले रेबीज के कारण किसी मानव मृत्यु की सूचना नहीं मिली। इस उपलब्धि के पीछे बड़े पैमाने पर कुत्ता टीकाकरण, कुत्तों की आबादी का प्रबंधन, निगरानी, समय पर PEP और समुदाय आधारित One Health व्यवस्था की भूमिका रही।

यह उदाहरण बताता है कि रेबीज को नियंत्रित करना केवल सैद्धांतिक लक्ष्य नहीं है। निरंतर टीकाकरण, निगरानी, उपचार और समुदाय की भागीदारी से वास्तविक बदलाव संभव है।

2030 तक ‘Zero by 30’ का लक्ष्य

वैश्विक स्तर पर “Zero by 30” पहल का उद्देश्य वर्ष 2030 तक कुत्तों से फैलने वाले रेबीज के कारण मानव मौतों को समाप्त करना है। इसके लिए कुत्तों का व्यापक टीकाकरण, लोगों को समय पर PEP उपलब्ध कराना और समुदायों में जागरूकता बढ़ाना प्रमुख उपाय हैं।

WHO के अनुसार सितंबर 2026 तक भूटान, चिली और मैक्सिको को कुत्तों से फैलने वाले मानव रेबीज को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने के लिए मान्यता मिल चुकी है।

विश्व रेबीज दिवस 2026 का संदेश

इस साल की थीम “Stronger Together” केवल एक जागरूकता संदेश नहीं है, बल्कि रेबीज नियंत्रण की वास्तविक रणनीति को भी दर्शाती है। इस बीमारी को रोकने के लिए केवल अस्पतालों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।

सरकारों को उपचार और वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। स्थानीय निकायों को कुत्तों के टीकाकरण और आबादी प्रबंधन को मजबूत करना होगा। पशु चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा। वहीं आम नागरिकों को पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार और काटने के बाद तत्काल उपचार के बारे में जागरूक होना होगा।

एक छोटी सी सावधानी बचा सकती है जान

रेबीज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि लक्षण आने के बाद यह लगभग हमेशा घातक है, लेकिन उससे पहले सही कदम उठाकर मौत को रोका जा सकता है।

इसलिए किसी संदिग्ध पशु के काटने या खरोंचने के बाद घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से धोएं और बिना देरी किए चिकित्सकीय सलाह लें। घरेलू उपचार के भरोसे न रहें और PEP की जरूरत के बारे में निर्णय स्वास्थ्यकर्मी पर छोड़ें।

रेबीज के खिलाफ लड़ाई में विज्ञान के पास जरूरी साधन मौजूद हैं। अब जरूरत इन साधनों को हर जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंचाने और बीमारी के स्रोत पर नियंत्रण करने की है। कुत्तों का टीकाकरण, समय पर उपचार और जागरूक समुदाय—इन तीनों की साझी ताकत से रेबीज-मुक्त भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

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